वृत्तानुपूर्व न च चातिदीर्थे जब्बे शुभे सृष्टवतस्तदीये । शेषाङ्गनिर्माणविधी विधातुर्लावण्य उत्पाद्य इवास यनः ॥
उसके गोल और क्रमबद्ध, न अधिक लंबे न छोटे, सुंदर अंगों को देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो विधाता ने शेष अंगों की रचना करते समय लावण्य को उत्पन्न कर उसमें स्थापित किया हो।
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