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कुमारसंभवम् • अध्याय 1 • श्लोक 33
अभ्युन्नताङ्गुष्ठनखप्रभाभिर्निक्षेपणाद्रागमिवोद्भिरन्तौ । आजहूतुस्तञ्चरणौ पृथिव्यां स्थलारविन्दश्रियमव्यवस्थाम् ॥
उसके ऊँचे अंगूठों के नखों की आभा से मानो पृथ्वी पर लालिमा बिखर गई और उसके चरणों ने स्थल पर खिले कमलों की शोभा को भी अस्थिर कर दिया।
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