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कुमारसंभवम् • अध्याय 1 • श्लोक 3
अनन्तरत्नप्रभवस्य यस्य हिमं न सौभाग्यविलोपि जातम् । एको हि दोषो गुणसन्निपाते निमज्जतीन्दोः किरणेष्विवाङ्कः ॥
जिसके अनंत रत्नों के उद्गम होने पर भी उसका हिम उसका सौभाग्य नष्ट नहीं करता; क्योंकि गुणों के समूह में एक दोष वैसे ही लुप्त हो जाता है जैसे चंद्रमा का कलंक उसकी किरणों में।
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