मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
कुमारसंभवम् • अध्याय 1 • श्लोक 24
तया दुहित्रा सुतरां सवित्री स्फुरत्प्रभामण्डलया चकासे । विदूरभूमिर्नवमेघशब्दा दुद्भिन्नया रत्नशलाकयैव ॥
उस कन्या के कारण सूर्य और भी अधिक अपने चमकते प्रकाशमंडल से शोभायमान हुआ, जैसे दूर की भूमि नव मेघ के गर्जन से विदीर्ण रत्न के समान प्रतीत होती है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुमारसंभवम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

कुमारसंभवम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें