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कुमारसंभवम् • अध्याय 1 • श्लोक 15
भागीरथीनिर्धारसिकराणां बोढा मुहमः कम्पितदेवदारुः । यद्वायुरन्विष्टमृर्गः किरातैरासेव्यते भिन्नशिशण्डिबईः ॥
जहाँ भागीरथी के जलकणों से युक्त वायु देवदारुओं को कंपित करती है, और जिसे खोजते हुए मृगों के पीछे किरात लोग टूटे हुए बाणों के साथ उसका सेवन करते हैं।
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