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कुमारसंभवम् • अध्याय 1 • श्लोक 14
यत्रांशुकाक्षेपविलज्जितानां पहच्छया किम्पुरुषाङ्गनानाम् । दरीगृहद्वार विलम्बिम्बीम्बास्तिरस्करिण्यो जलदा भवन्ति ॥
जहाँ किम्पुरुषों की स्त्रियाँ अपने वस्त्र हट जाने से लज्जित होकर पर्वत की गुफाओं के द्वारों पर लटकते बादलों को आड़ के रूप में उपयोग करती हैं।
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