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कुमारसंभवम् • अध्याय 1 • श्लोक 13
लाङ्गुलविक्षेपविसर्पिशीभिरितस्ततश्चन्द्र मरीचिगरिः । यस्यार्थयुक्त गिरिराजशब्दं कुर्वन्ति वालव्यजनैधमर्यः ॥
जहाँ इधर-उधर हिलती हुई पूँछों के समान फैलती चंद्रमा की किरणों से युक्त पर्वत को देवता लोग अपने पंखों से किए गए सेवाकार्य द्वारा गिरिराज कहकर पुकारते हैं।
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