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क्षुरिक • अध्याय 1 • श्लोक 7
द्वे जानुनी तथोरुभ्यां गुर्दे शिश्रे त्रयस्त्रयः। वायोरायतनं चात्र नाभिदेशे समाश्रयेत् ॥
इसके बाद नाभि प्रदेश में प्राणों की धारणा करे। (कटि प्रदेश से नीचे का भाग, जो मूलाधार एवं स्वाधिष्ठान चक्रों से सम्बद्ध उसमें प्राण-प्रवाह की धारणा स्थिर होने के बाद क्रमशः नाभि, हृदय, कण्ठ एवं उससे ऊपर मन-बुद्धि (आज्ञा-सहरू आदि) तक प्राण-प्रवाह द्वारा धारणा को दूढ़ करने का संकेत आगे के मंत्रों में किया गया है)
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