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क्षुरिक • अध्याय 1 • श्लोक 6
स्थिरमात्रादृढं कृत्वा अङ्गुष्ठेन समाहितः । द्वे तु गुल्फे प्रकुर्वीत जड्क्ते चैव त्रयस्त्रयः ।।
धारणा युक्त उक्त प्राणायाम का अभ्यास दृढ़ हो जाने पर, पूरी सावधानी के साथ पैर के अंगूठे सहित टखनों में दो-दो बार, (टखनों और घुटनों के बीच के भाग) जंघाओं या पिंडलियों में तीन-तीन बार, घुटनों और ऊरु (जाँघों) में दो-दो बार तथा गुदा एवं जननेन्द्रिय में तीन-तीन बार (प्राणायाम द्वारा) प्राणों के संचार को धारणा करे।
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