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क्षुरिक • अध्याय 1 • श्लोक 5
प्राणान्संधारयेत्तस्मिन्नासाभ्यन्तरचारिणः । भूत्वा तत्र गतप्राणः शनैरथ समुत्सृजेत् ॥
इस स्थिति में नासिका द्वारा संचरित प्राण को (कुम्भक के द्वारा) सभी स्थानों में धारण करे। जहाँ-तहाँ प्राणों का संचरण हो जाने पर फिर धीरे-धीरे वायु को (रेचक क्रिया द्वारा) बाहर छोड़ दे। (ॐ कार में तीन मात्राएँ होती हैं। १२ मात्रा का अर्थ हुआ, ४ बार ओंकार के सहज उच्चारण जितना समय लगाकर पूरक करे। उसी अनुसार कुम्भक एवं रेचक की मात्रा निश्चित करे।)
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