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क्षुरिक • अध्याय 1 • श्लोक 25
अमृतत्वं समाप्नोति यदा कामात्प्रमुच्यते। सर्वेषणाविनिर्मुक्तश्छित्त्वा तन्तुं न बध्यते छित्त्वा तन्तुं न बध्यते। इत्युपनिषत् ।। ॐ सह नाववतु....इति शान्तिः ॥॥ इति क्षुरिकोपनिषत्समाप्ता ।।
जब वह (योगी मनुष्य) कामनाओं से छूट जाता है तथा एषणाओं से रहित हो जाता है, तभी (वह) अमृतत्व को प्राप्त कर सकता है और पुनः बन्धनों में नहीं बँधता। क्षुरिकोपनिषद् का यही रहस्य है।
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