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क्षुरिक • अध्याय 1 • श्लोक 22
पाशं छित्त्वा यथा हंसो निर्विशङ्कः खमुत्क्रमेत्। छित्रपाशस्तथा जीवः संसारं तरते सदा ॥
जिस प्रकार बन्धन-जाल को काटकर हंस निःशंक होकर आकाश में गमन कर जाता है, उसी प्रकार योगी मनुष्य इस योग के अभ्यास द्वारा सभी बन्धनों के कट जाने के पश्चात् बन्धन मुक्त होकर संसार-सागर से सदा के लिए पार हो जाता है।
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