एवं शुभाशुभैर्भावैः सा नाडी तां विभावयेत्।
तद्भाविताः प्रपद्यन्ते पुनर्जन्मविवर्जिताः ॥
इस प्रकार योगी को चाहिए कि वह शुभाशुभ भावों से युक्त विभिन्न नाड़ियों को समझे। उनसे परे सुषुम्ना नाड़ी में धारणा स्थिर करने से योगी पुनर्जन्म से रहित होकर शाश्वत परमब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।
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