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क्षुरिक • अध्याय 1 • श्लोक 18
छिन्द्यते ध्यानयोगेन सुषुप्रैका न छिद्यते। योगनिर्मलधारेण क्षुरेणानलवर्चसा ॥
ध्यान योग के द्वारा समस्त नाड़ि‌यों का छेदन किया जा सकता है; किन्तु एक सुषुम्ना ही ऐसी है जिसका कि छेदन नहीं किया जाता। धीर पुरुष को इस जन्म में आत्मा के प्रभाव से अग्निवत् तेजोमयी एवं योग रूपी निर्मल धार से मुक्त (धारणा रूपी) छुरी से सैकड़ों (सभी) नाड़ि‌यों का छेदन करना चाहिए।
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