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क्षुरिक • अध्याय 1 • श्लोक 11
तद्भित्त्वा कण्ठमायाति तां नाडीं पूरयन्यतः । मनसस्तु परं गुहां सुतीक्ष्णं बुद्धिनिर्मलम् ॥
उस (हृदयक्षेत्र) के बाद नाड़ियों को पूरित करता हुआ (प्राण-प्रवाह) कण्ठ में आता है। उसके बाद मनःक्षेत्र और उससे परे गुह्य, निर्मल और तीक्ष्ण बुद्धि का स्थान है।
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