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क्षुरिक • अध्याय 1 • श्लोक 10
ततो रक्तोत्पलाभासं हृदयायतनं महत्। दहरं पुण्डरीकं तद् वेदान्तेषु निगद्यते ॥
उस (नाभि) के बाद वेदान्त में जिसे दहर या पुण्डरीक कहा गया है, वह महत् आयतन वाला हृदय क्षेत्र है। वह क्षेत्र रक्त कमल की तरह सदा प्रकाशित रहता है।
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