निश्चय ही इस वाणी ने इस प्रज्ञा के एक अंग की क्षति-पूर्ति की है। बाहर की ओर उसके (वाणी के) विषय रूप से कल्पित (भूतमात्रा अर्थात् पञ्चभूतों का अंश विशेष) नाम शब्द है। प्राणेन्द्रिय में भी इस प्रज्ञा के एक अंग की पूर्ति की है। बाहर की तरफ उस प्राणेन्द्रिय के विषयरूप से जो कल्पित भूतमात्रा है, वह गन्ध है। चक्षु ने भी इस प्रज्ञा के एक अंग की पूर्ति की है। बाहर की तरफ से उसके विषय रूप से कल्पित जो भूतमात्रा है, वही रूप है। ऐसे ही कर्णेन्द्रिय ने भी इस प्रज्ञा के एक अंग की क्षति पूर्ति की है। बाहर की तरफ से उसके विषय रूप से कल्पित जो भूत मात्रा है, वही शब्द है। स्वादेन्द्रिय ने भी इस प्रज्ञा के एक अंग की पूर्ति की है। बाहर की तरफ से उसके विषय रूप से कल्पित जो भूत मात्रा है, वही अन्न का रस है। इसी प्रकार निश्चय ही हाथों ने भी प्रज्ञा के एक अंग की पूर्ति की है। बाहर की ओर से उनके विषय रूप से कल्पित जो भूत मात्रा है, वहाँ कर्म है। ऐसे ही शरीर ने भी प्रज्ञा के एक अंग की पूर्ति की है। बाहर की ओर उसके विषय रूप से कल्पित जो भूत मात्रा है, वही सुख एवं दुःख है। इसी तरह निश्चय ही उपस्थ ने भी उस प्रज्ञा के एक अंग की पूर्ति की है, बाहर की तरफ उसके विषय रूप से कल्पित जो भूत मात्रा है, वही रति, आनन्द एवं प्रजा (सन्तान) की उत्पत्ति है। अवश्य ही पैरों ने भी इस प्रज्ञा के एक अंग की पूर्ति की है। बाहर की ओर उनके विषय रूप से कल्पित जो भूतमात्रा है, वह विचरण-क्रिया है। ऐसे ही प्रज्ञा के एक अंग की प्रज्ञा ने ही पूर्ति की है। उस (प्रज्ञा) से सम्बन्धित बाह्य विषय रूप से कल्पित जो भूतमात्रा है, वह बुद्धि के द्वारा अनुभूत वस्तुएँ एवं मनुष्योचित इच्छाएँ-कामनाएँ हैं।
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