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कौषीतकिब्राह्मण • अध्याय 1 • श्लोक 5
स आगच्छतील्यं वृक्षं तं ब्रह्मगन्धः प्रविशति, स आगच्छति सालज्यं संस्थानं तं ब्रह्मरसः प्रविशति, स आगच्छत्यपराजितमायतनं तं ब्रह्मतेजः प्रविशति स आगच्छति । इन्द्रप्रजापती द्वारगोपौ तावस्मादपद्रवतः स आगच्छति विभुप्रमितं तं ब्रह्मतेजः प्रविशति स आगच्छति विचक्षणामासन्दीं बृहद्रथन्तरे सामनी पूर्वी पादौ श्यैतनौधसे चापरौ वैरूपवैराजे अनूच्येते शाक्कररैवते तिरश्ची सा प्रज्ञा प्रज्ञया हि विपश्यति स आगच्छत्यमितौजसं पर्यङ्कं स प्राणस्तस्य भूतं च भविष्यच्च पूर्वी पादौ श्रीश्चेरा चापरौ बृहद्रथंतरे अनूच्ये भद्रयज्ञायज्ञीये शीर्षण्ये ऋचश्च सामानि च प्राचीनातानानि यजूंषि तिरश्चीनानि सोमांशव उपस्तरणमुद्गीथ उपश्रीः श्रीरुपबर्हणं तस्मिन्ब्रह्मास्ते तमित्थंवित्पादेनैवाग्र आरोहति । तं ब्रह्मा पृच्छति कोऽसीति तं प्रतिब्रूयात् ॥
इसके पश्चात् वह (पुरुष) 'इल्य' नामक वृक्ष के पास गमन करता है। उस समय उसकी घ्राणेन्द्रिय में ब्रह्म-गन्ध का प्रवेश होता है। तदनन्तर वह 'सालज्य' नामक नगर के पास आता है, वहाँ उसकी स्वादेन्द्रिय में उस दिव्यातिदिव्य ब्रह्मरस की अनुभूति होती है, जिसका कि उसे इसके पहले कभी भी अनुभव नहीं हुआ होता। इसके बाद वह 'अपराजित' नाम वाले ब्रह्म मन्दिर के पास में आता है। वहाँ पर उसमें ब्रह्मतेज का प्रवेश होता है। फिर वह द्वार रक्षक इन्द्र एवं प्रजापति के समीप में गमन करता है, प्रजापति उसके सामने से रास्ता छोड़‌कर अलग हट जाते हैं। इसके अनन्तर वह 'विभुप्रमित' नामक सभा मण्डप में पहुँचता है, वहाँ पर उसके अन्तःकरण में ब्रह्मयज्ञ प्रविष्ट करता है, फिर वह 'विचक्षणा' नाम से युक्त वेदी के समीप में आता है। 'बृहत्' एवं 'रथन्तर' ये दो साम उस पलंग के दोनों अग्रभाग के पाये हैं और 'श्यैत' एवं 'नौधस' नामक साम उसके दोनों पृष्ठ भाग के पाये हैं। 'वैरूप' तथा 'वैराज' नाम से युक्त ये साम उसके दक्षिणी एवं उत्तरी पार्श्व है। 'शाकर' एवं 'रैवत' नामक साम उसके पूर्वी और पश्चिमी पाचं हैं। वह समष्टि-बुद्धिरूपा है। वह ब्रह्मवेत्ता उस बुद्धि के माध्यम से विशेष दृष्टि प्राप्त कर लेता है। इसके बाद वह 'अमितौजस्' नामक पलंग अथवा सिंहासन के समीप में आता है, वह पर्यङ्क (पलंग) प्राणरूप ही है, भूत एवं भविष्यत् काल उसके अग्रभाग के पाये हैं, श्रीदेवी या भूदेवी ये दोनों उस सिंहासन के पृष्ठभाग के पाये हैं। उसके उत्तर एवं दक्षिण क्षेत्र में जो 'अनुच्य' नामक दीर्घ खट्वाङ्ग हैं, वे 'बृहत्' एवं 'रथन्तर' नाम से युक्त साम हैं और पूर्व एवं पश्चिम क्षेत्र में जो छोटे खट्‌वाङ्ग हैं और जिन पर सिर एवं पैर रखे जाते हैं, वे 'यज्ञायज्ञीय' नामक साम है। पूर्व से पश्चिम दीर्घाकार के रूप में लगी हुई पाटियाँ ऋक् एवं साम की प्रतीक हैं। दक्षिण एवं उत्तर की ओर जो आड़ी तिरछी लगी हुई पाटियाँ हैं, स्वयं यजुर्वेद स्वरूप ही हैं। चन्द्रमा की कोमल एवं शीतल रश्मियाँ ही उस पर्यङ्क (पलंग) के मुलायम गरे के रूप में हैं। उद्‌गीथ ही उस पर बिछी हुई उपश्री अर्थात् थेत चादर है। श्रीलक्ष्मी जी, उस पलंग पर तकिया के रूप में हैं। ऐसे दिव्य पर्वङ्क पर भगवान् ब्रह्माजी सुशोभित होते हैं। इस श्रेष्ठ तत्त्वज्ञान को इस प्रकार से भली-भाँति जानने वाला ब्रह्मज्ञानी उस पलंग पर सर्वप्रथम पैर रखकर आसीन होता है। तदनन्तर ब्रह्माजी उस ब्रह्मज्ञानी से प्रश्न करते हैं - तुम कौन हो? उन भगवान् ब्रह्माजों के प्रश्न का उत्तर उसे इस प्रकार से देना चाहिए।
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