नात्यर्थ सुखदुःखाभ्यां शरीरमुपतापयेत्। स्तूयमानो न तुष्येत निन्दितो न शपेत्परान् ॥
वह अधिक विश्राम न करे अथवा अधिक परिश्रम से शरीर को व्यर्थ में कष्ट न दे। वह दूसरों के द्वारा अपनी प्रशंसा श्रवण करके न प्रसन्न हो तथा न निन्दा या अपमान किये जाने पर गाली अथवा शाप दे।
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