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कठरुद्र • अध्याय 1 • श्लोक 48
सर्ववेदान्तसिद्धान्तसारं वच्मि यथार्थतः। स्वयं मृत्वा स्वयं भूत्वा स्वयमेवावशिष्यते ॥
मैंने वेदान्त के सर्वसिद्धान्तों का सार यथार्थरूप में कहा है। अपने कर्मों से जीव स्वयं ही उत्पन्न होता है, स्वयं ही मृत्यु को प्राप्त होता है और स्वयं ही अवशिष्ट रूप में बचा रहता है। यह सब आत्मा का ही खेल है, आत्मा के अतिरिक्त अन्य कोई दूसरा तत्त्व नहीं है। यही इस उपनिषद् का रहस्य है।
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