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कठरुद्र • अध्याय 1 • श्लोक 47
सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं स्वात्मानं भावयेत्सुधीः । एवं यो वेद तत्त्वेन ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥
इसलिए बुद्धिमान् पुरुष, अपने आपको 'मैं सब उपाधियों से मुक्त हूँ' - ऐसा मानकर मुक्तावस्था का सतत चिंतन करे। इस प्रकार जो तत्त्वतः जानता है, वह ब्रह्मत्व को प्राप्त करने में सदा ही समर्थ होता है।
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