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कठरुद्र • अध्याय 1 • श्लोक 35
भवन्ति सुखिनो नित्यं तारतम्यक्रमेण तु । तत्तत्पदविरक्तस्य श्रोत्रियस्य प्रसादिनः ॥
इस लोक और परलोक के भोगों से विरक्त, प्रसन्नमना श्रोत्रिय को यह स्वरूप भूत-आनन्द स्वयमेव अनुभूत होता है।
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