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कठरुद्र • अध्याय 1 • श्लोक 33
सद्रूपं परमं ब्रह्म त्रिपरिच्छेदवर्जितम्। यदा होवैष एतस्मिन्नल्पमप्यन्तरं नरः॥
जब तक मनुष्य को इसमें थोड़ा भी व्यवधान दृष्टिगोचर होता है, तब तक उसे (जन्म-मृत्यु का) भय बना रहता है।
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