निर्भेदं परमाद्वैतं विन्दते च महायतिः । तदेवाभयमित्यन्तं कल्याणं परमामृतम् ॥
वही महायति (संन्यासी) है। देश-काल एवं पात्र से अपरिच्छिन्न, सत्यस्वरूप परब्रह्म ही अभयपद, परम अमृततुल्य एवं कल्याणमय है।
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