को जीवति नरो जातु को वा नित्यं विचेष्टते । तस्मात्सर्वात्मना चित्ते भासमानो ड्रासौ नरः ॥
अतः जो सर्वान्तर्यामी रूप से सभी के चित्त में प्रतिभासित होता है, वहीं परब्रह्म अविनाशी परमात्मा दुःखों से घिरे हुए जीवात्मा को सदैव आनन्द प्रदान करता है।
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