सुखी भवति सर्वत्र अन्यथा सुखिता कुतः । असत्यस्मिन्परानन्दे स्वात्मभूतेऽखिलात्मनाम्॥
इसके अतिरिक्त अन्यत्र सुख का भाव कहाँ है? सम्पूर्ण भूत-प्राणियों के आत्मस्वरूप इस परानन्द (परमानन्द) ब्रह्म के उपस्थित न रहने पर भला कौन मनुष्य जीवित रह सकता है अथवा कौन-सा प्राणी नित्य चेष्टा करता है?
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