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कठरुद्र • अध्याय 1 • श्लोक 28
यदिदं ब्रह्मपुच्छाख्यं सत्यज्ञानाद्वयात्मकम् । सारमेव रसं लब्ळ्या साक्षादेही सनातनम् ॥
जो यह ज्ञान एवं सत्य के रूप में अद्वितीय परब्रह्म है, वही सबका आश्रय स्थल है। वह सबका सार एवं रसस्वरूप है। उस सनातन तत्त्व को पाकर के यह देही (जीवात्मा) सर्वत्र सुखानुभव प्राप्त करता है।
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