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कठरुद्र • अध्याय 1 • श्लोक 27
तथानन्दमयश्चापि ब्रह्मणोऽन्येन साक्षिणा। सर्वान्तरेण पूर्णश्च ब्रह्म नान्येन केनचित् ॥
आनन्दमय आत्मा अपने से अलग साक्षिरूप सर्वत्र व्याप्त, अन्तर्यामी ब्रह्म के द्वारा परिपूर्ण है। वह ब्रह्म किसी दूसरे के द्वारा नहीं; वरन् अपने आप ही सभी तरफ से परिपूर्ण है। (यहाँ पंच कोश और पंचात्मा का मर्म स्पष्ट किया गया है। हर काया को आकार अन्नमय से, ऊर्जा प्राणमय से, कामना मनोमय से, मैसर्गिक विभूतियाँ आदि विज्ञानमय से तथा आनन्दानुभूति आनन्दमय कोश से प्राप्त होती है। किसी स्थूल माध्यम से व्यक्त होने के कारण उसे आत्मा तथा किसी सूक्ष्म से परिपूर्ण होने के नाते उसे कोश कहा गया है)
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