आकाशाद्वायुसंज्ञस्तु स्पर्शोऽपञ्चीकृतः पुनः । वायोरग्निस्तथा चाग्नेराप अद्भ्यो वसुन्धरा ॥
इसके पश्चात् पुनः आकाश से वायु संज्ञक अपञ्चीकृत स्पर्श-तन्मात्राओं की उत्पत्ति हुई। तदनन्तर वायु से अग्नि की उत्पत्ति, अग्नि से जल की उत्पत्ति और जल से पृथिवी की उत्पत्ति हुई।
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