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कठरुद्र • अध्याय 1 • श्लोक 17
प्रत्यगात्मानमज्ञानमायाशक्तेश्च साक्षिणम्। एकं ब्रह्माहमस्मीति ब्रहौव भवति स्वयम् ॥
उसकी सभी इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं। अज्ञान एवं माया शक्ति के साक्षीरूप प्रत्यगात्मा को जो मनुष्य 'मैं एक ब्रह्मस्वरूप हूँ' इस प्रकार जानता है, वह (मनुष्य) स्वयं ही ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। (ब्रह्मसाक्षात्कार कर लेने वाले साधक को यह गूढ़ तथ्य समझ में आने लगता है कि अव्यक्त आत्मतत्त्व से किस प्रकार व्यक्त सृष्टि प्रकट होती है। सृष्टि का यह क्रम आगे के मंत्रों में स्पष्ट किया गया है)
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