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कठरुद्र • अध्याय 1 • श्लोक 16
निहितं ब्रह्म यो वेद परमे व्योग्नि संज्ञिते। साऽश्रुते सकलान्कामान्क्रमेणैव द्विजोत्तमः ॥
उस ब्रह्म को मात्र विद्या (सज्ञान) के माध्यम से ही जाना जाता है। जो मनुष्य परम व्योम रूपी नित्य धाम में विद्यमान इस अविनाशी ब्रह्म को जानता है, वह (द्विजों में श्रेष्ठ) ब्राह्मण क्रमानुसार समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लेता है।
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