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कैवल्य • अध्याय 1 • श्लोक 6
विविक्तदेशे च सुखासनस्थः शुचिः समग्रीवशिरः शरीरः । अन्त्याश्रमस्थः सकलेन्द्रियाणि निरुच्य भक्त्या स्वगुरुं प्रणम्य ॥
(योगीजन) स्नान आदि से अपने शरीर को शुद्ध करने के पश्चात् एकान्त स्थान में सुखासन से बैठें। उसके पश्चात् ग्रीवा, सिर तथा शरीर को एक सीध में रखकर समस्त इन्द्रियों का निरोध करके भक्तिपूर्वक अपने गुरु को प्रणाम करें। तदनन्तर संन्यास आश्रम में स्थित (वे) योगीजन अपने हृदय-कमल में रजोगुण से रहित, विशुद्ध, दुःख-शोक से रहित आत्म तत्त्व का विशद चिन्तन करें।
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