जिन (योगीजनों) ने वेदान्त के विशेष ज्ञान से एवं श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन (अनुभूति) के द्वारा (उस) परमात्मतत्त्व को प्राप्त करने का दृढ़ निश्चय कर लिया है, ऐसे में पवित्र अन्तःकरण से युक्त योगीजन संन्यास-योग के द्वारा बहालोक में गमन करके अमृततुल्य हो कल्पान्त में मुक्त हो जाते हैं।
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