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कैवल्य • अध्याय 1 • श्लोक 24
एवं विदित्वा परमात्मरूपं गुहाशयं निष्कलमद्वितीयम्। समस्तसाक्षिं सदसद्विहीनं प्रयाति शुद्धं परमात्मरूपम्॥
जो भी मनुष्य अविनाशी ब्रह्म को इस प्रकार से गुहा - अर्थात् बुद्धि के गहर में स्थित, निष्कल (अंग विहीन) एवं अद्वितीय, सदसत् से परे, सभी के साक्षीरूप में विद्यमान जानता है, वह पवित्रतम परमात्मस्वरूप को प्राप्त कर लेता है।
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