एवं विदित्वा परमात्मरूपं गुहाशयं निष्कलमद्वितीयम्। समस्तसाक्षिं सदसद्विहीनं प्रयाति शुद्धं परमात्मरूपम्॥
जो भी मनुष्य अविनाशी ब्रह्म को इस प्रकार से गुहा - अर्थात् बुद्धि के गहर में स्थित, निष्कल (अंग विहीन) एवं अद्वितीय, सदसत् से परे, सभी के साक्षीरूप में विद्यमान जानता है, वह पवित्रतम परमात्मस्वरूप को प्राप्त कर लेता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कैवल्य के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।