न पुण्यपापे मम नास्ति नाशो न जन्म देहेन्द्रियबुद्धिरस्ति । न भूमिरापो न च वह्निरस्ति न चानिलो मेऽस्ति न चाम्बरं च ॥
मुझ (ब्रह्म) को पुण्य-पापादि कर्म स्पर्श नहीं करते, मैं कभी विनष्ट नहीं होता और न ही मेरा कभी जन्म ही होता है। न मेरे शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ ही हैं। मेरे लिए न भूमि है, न जल है, न अग्रि है, न वायु है और न आकाश तत्त्व ही है।
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