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कैवल्य • अध्याय 1 • श्लोक 21
अपाणिपादो ऽहमचिन्त्यशक्तिः पश्याम्यचक्षुः स शृणोम्यकर्णः । अहं विजानामि विविक्तरूपो न चास्ति वेत्ता मम चित्सदाहम् ॥
वह हाथ-पैरों से रहित होते हुए भी सतत गतिशील है, जो चिन्तन से परे है, ऐसा शक्ति स्वरूप ब्रह्म मैं ही हूँ। मैं नेत्रों के अभाव में सभी कुछ देखता हूँ, कानों के बिना भी सब कुछ श्रवण करता हूँ, बुद्धि आदि से पृथक् होकर भी मैं सब कुछ जानता हूँ; किन्तु मुझे जानने वाला कोई नहीं है, मैं सदा ही चित् स्वरूप हूँ।
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