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कैवल्य • अध्याय 1 • श्लोक 20
अणोरणीयानहमेव तद्वन्महानहं विश्वमहं विचित्रम् । पुरातनोऽहं पुरुषोऽहमीशो हिरण्मयोऽहं शिवरूपमस्मि ॥
मैं (परब्रहा) अणु से भी अणु अर्थात् परमाणु हूँ, ठीक ऐसे ही मैं महान् से महानतम अर्थात् विराट् पुरुष हूँ, यह विचित्रताओं से भरा-पूरा सम्पूर्ण विश्व ही मेरा स्वरूप है। मैं पुरातन पुरुष हूँ, मैं ही इंद्र हूँ, मैं ही हिरण्यमय पुरुष हूँ और मैं ही शिवस्वरूप (परमतत्व हूँ)।
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