इसी से प्राण, मन एवं समस्त इन्द्रियों की उत्पत्ति होती है; आकाश, वायु, अग्नि, जल और समस्त विश्व का धारण-पोषण करने वाली पृथ्वी की उत्पत्ति होती है।
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