ज्ञानीजन अपनी आत्मा अर्थात् अन्तःकरण को नीचे की अरणि एवं ॐकार (प्रणव) को ऊर्ध्व को अरणि बनाते हुए ज्ञानरूपी मन्यन के अभ्यास-प्रक्रिया द्वारा जगत् के बन्धनों-पापों को विनष्ट कर डालते हैं अर्थात् ज्ञानाग्रि में जलाकर भस्म कर देते हैं।
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