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जाबाल • अध्याय 4 • श्लोक 3
ग्रामादग्निमाहृत्य पूर्ववदग्निमाघ्नापयेत्। यद्यग्निं न विन्देदप्सु जुहुयात्। आपो वै सर्वा देवताः। सर्वाभ्यो देवताभ्यो जुहोमि स्वाहेति हुत्वा समुद्धत्य प्राश्नीयात्साज्यं हविरनामयं मोक्षमन्त्रस्त्रय्येवं विन्देत्। तद्ब्रहौतदुपासितव्यम्। एवमेवैतद्भगवन्निति वै याज्ञवल्क्यः ॥
ग्राम से (गाँव के किसी श्रोत्रिय के गृह से) अग्नि को लाकर पूर्व वर्णित मन्त्र द्वारा उसका अवघ्राण करना (सूँघना) चाहिए। यदि अग्नि प्राप्त न हो, तो जल में आहुति प्रदान करनी चाहिए, क्योंकि जल ही समस्त देवता रूप है। मैं समस्त देवताओं को आहुति प्रदान कर रहा हूँ, ऐसा भाव करके जल में आहुति प्रदान करके घृत युक्त उस अवशिष्ट हविष्पात्र को उठाकर ग्रहण करे। मोक्षमन्त्र तीन अक्षरों (अउम् ॐ) वाला है, ऐसा जानना चाहिए। वही ब्रह्म है और वही उपासना के योग्य है। ऐसा भगवान् याज्ञवल्क्य ने कहा।
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