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जाबाल • अध्याय 2 • श्लोक 1
अच हैनमत्रिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्यं य एषोऽनन्तोऽव्यक्त आत्मा तं कथमहं विजानीयामिति। स होवाच याज्ञवल्क्यः सोऽविमुक्त उपास्यो व एषोऽनन्तोऽव्यक्त आत्मा सोऽविमुक्ते प्रतिष्ठित इति ॥
इसके पश्चात् अत्रि मुनि ने याज्ञवल्क्य ऋषि से पूछा - इस अनन्त और अव्यक्त आत्मा को किस प्रकार जाना जा सकता है? याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया - इसका ज्ञान प्राप्त करने के लिए अविमुक्त की ही उपासना करनी चाहिए, क्योंकि वह अनन्त और अव्यक्त आत्मा अविमुक्त में ही प्रतिष्ठित है।
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