एवमभ्यासयुक्तस्य पुरुषस्य महात्मनः । क्रमाद्वेदान्तविज्ञानं विजायेत न संशयः ॥
इस प्रकार से ध्यान के अभ्यास में जो भी बुद्धिमान् पुरुष लगा रहता है, उसे वेदान्त वर्णित ब्रह्म तत्त्व का निःसन्देह ही विशेष ज्ञान प्राप्त हो जाता है - इसमें कुछ भी संशय नहीं है।
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