अथवा तव वक्ष्यामि धारणां मुनिपुङ्गव। पुरुषे सर्वशास्तारं बोधानन्दमयं शिवम् ॥
हे मुनिश्रेष्ठ! अब तुम्हारे लिए एक और दूसरी धारणा का वर्णन करता हूँ। ज्ञानी मनुष्य अन्तर्यामी पुरुष (आत्मा) में सभी पर शासन करने वाले बोधमय, आनन्दस्वरूप तथा कल्याणमय अविनाशी परमात्मतत्त्व की प्रत्येक दिन धारणा करे।
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