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जाबाल दर्शन • अध्याय 8 • श्लोक 3
हबरावलकाराख्यं मंत्रमुच्चारयेत्क्रमात्। धारणैषा परा प्रोक्ता सर्वपापविशोधिनी ॥
हर एक तत्त्व की धारणा के समय क्रमशः हं, यं, रं, वं, लं - इन बीजमंत्रों का उच्चारण करे। इस धारणा को सर्वोत्तम बताया है। यह पापों का विनाश करने वाली क्रिया है।
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