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जाबाल दर्शन • अध्याय 8 • श्लोक 1
अथातः संप्रवक्ष्यामि धारणाः पञ्च सुव्रत। देहमध्यगते व्योग्नि बाह्याऽऽकाशं तु धारयेत् ॥
हे सुव्रत! अब मैं तुम्हारे लिए पन्च धारणाओं के सम्बन्ध में बतलाता हूँ। अपने शरीर के अन्दर जो आकाश तत्त्व स्थित है,
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