धारयेत्पूरितं विद्वान्प्रणवं संजपन्वशी। उकारमूर्ति स ध्यायंश्चतुःषष्ठ्या तु मात्रया ॥
जब वायु पूरी तरह से उदर में भर जाये, तब विद्वज्जन मन एवं इन्द्रियों को अपने वश में रखते हुए चौसठ मात्राओं से उकार के ध्यान सहित ॐकार का जप करते हुए वायु को अन्दर धारण किये रहे।
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