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जाबाल दर्शन • अध्याय 6 • श्लोक 7
पुनः पिङ्गलयापूर्य मात्रैः षोडशभिस्तथा। अकारमूर्तिमत्रापि स्मरेदेकाग्रमानसः ॥
इसके पश्चात् पुनः पिङ्गला नाड़ी के द्वारा वायु को शनैः शनैः अन्दर खींचते हुए षोडश मात्रा से अकार स्वरूप प्रणव का ध्यान मन को एकाग्र करके करना चाहिए।
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