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जाबाल दर्शन • अध्याय 6 • श्लोक 5
यावद्वा शक्यते तावद्धारयेज्जपतत्परः । पूरितं रेचयेत्पश्चान्मकारेणानिलं बुधः ॥
जब तक सम्भव हो सके, तब तक जप में मन को एकाग्र करके वायु को आत्मसात् किये रहे। तत्पश्चात् विद्वान् पुरुष बत्तीस मात्राओं का समय लगाकर मकार प्रमुख ॐकार के भाव सहित पिङ्गला नाड़ी के माध्यम से शनैः शनैः धारण की हुई वायु को बाहर निकाले।
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