उसमें श्वास रोकने से कुंडलिनी में विधिवत प्रज्वलित अग्नि स्थापित हो जाती है। श्वास इस अग्नि को अपने साथ लेकर सुसुम्ना के मार्ग से ऊपर की ओर उठने लगती है।
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