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जाबाल दर्शन • अध्याय 6 • श्लोक 41
प्रणवेन नियुक्तोन बिन्दुपुक्छेन बुद्धिमान्। मूलण्यारस्य विप्रेन्द्र मध्ये तं तु निरोधयेत्।।
श्वास को उसके छिद्र के माध्यम से जननांग के अग्र भाग की ओर खींचकर मूलाधार के मध्य में स्थापित करना चाहिए। उसमें श्वास रोकने से
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